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    ना जाने किस दिशा किस डगर जा रहा है हिंदुस्तान का बचपन पढ़ने लिखने की उम्र में गलियों कूचों का कचरा बीन रहा है बचपन तन पर कपड़े मैले कुचैले कंधो पे लादे फटे कट्टे लिए भविष्य ढूँढ रहा है बचपन बेचकर के कचरा कोड़ियों के दाम में बिक रहा है बचपन पैरों के तलवे…

  • स्त्री हूँ मैं, स्त्री

    स्त्री हूँ मैं, स्त्री वात्सल्य से भरी गागर हूँ मैं ज्ञान से परिपूर्ण सागर हूँ मैं स्वभाव से चंचल नदी हूँ मैं काया से कोमल परी हूँ मैं प्रेम की बरखा हूँ मैं मोह का झरना हूँ मैं कड़ी धूप में छाँव हूँ मैं भरे शहर और गाँव हूँ मैं मेरे रूप स्वरूप हैं निराले…

  • ‘‘माँ‘‘

    मदर्स डे 11.05.2013 केअवसरपरमेरीएकमौलिककृतिकविता (‘‘माँ‘‘) सरल शब्दों में आपके समक्ष रख रहा हूँ, उम्मीद करता हूँ आपको पसन्द आयेगी।   ‘‘माँ‘‘ जिन्दगी है मेरी ‘‘माँ‘‘ दुनिया है मेरी मुझे झूला झुलाती हैं माँ खुद आँखों में लिए नींद रात बिताती हैं माँ खुद गीले में सोती है मुझे सूखे पे सुलाती हैं माँ खुद भूखी रह जाती हैं मेरा…

  • दर्द लिखने की आदत

    दर्द लिखने की आदत सी हो गई है मुझे दिल के ज़ख्म नासूर जो बन चुके हैं मेरे कागज़ भी अब ज़ख़्मी नज़र आने लगा है क़लम भी रक्त की स्याही से जो भरी है मेरे जिसे ज़माना बादलों की गर्जना कहता है वो आहों के कराहने की आवाज़ हैं मेरे हज़ारों तोहमतें लगा दो…

  • आओ कुछ मशालें खरीद लें

    आख़िर कब तक मोमबत्तियां लेकर यूँ ही सड़कों पर उतरेंगें आओ कुछ मशालें खरीद लें अस्मत के लुटरों को राख कर दें हम क्यूँ कुछ नहीं बदलता है क्या हमारी आँखों का पानी मर चुका है या सब कुछ मूक दर्शक की भाँति देख सहने की आदत डाल चुके हैं हम ख़ुद की सुरक्षा माँगना…

  • नारी तू शक्ति है

    जाने कितने युग है बीते जाने कितनी सदियाँ हर इक युग है तेरी गाथा हर इक सदी बस तेरी माया तेरा वर्चस्व तू ही है दूजा ना कोई ओर तेरे आगे नतमस्तक है दिशायें भी चारों ओर जितनी शीतलता है तुझमें उतनी भीष्ण उष्णता जितनी ख़ामोशी है तुझमें उतनी क्रोधाग्नि की ज्वाला जितना दर्द तू…

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