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    होली के पर्व पर मेरी ये रचना सरहद पर मुस्तैद जवानों को समर्पित। किन रंगों को मैं उछालूँ ?क्या ? उन रंगों को मैं उछालूँजिन रंगों से माँ की ओढ़नी कोबन रंगरेज़ा नितदिन रंगा करता था किन रंगों को मैं उछालूँ ?क्या ? उन रंगों को मैं उछालूँजो बचपन में दोस्तों संगहोली में खेला करता…

  • ‘‘माँ‘‘

    मदर्स डे 11.05.2013 केअवसरपरमेरीएकमौलिककृतिकविता (‘‘माँ‘‘) सरल शब्दों में आपके समक्ष रख रहा हूँ, उम्मीद करता हूँ आपको पसन्द आयेगी।   ‘‘माँ‘‘ जिन्दगी है मेरी ‘‘माँ‘‘ दुनिया है मेरी मुझे झूला झुलाती हैं माँ खुद आँखों में लिए नींद रात बिताती हैं माँ खुद गीले में सोती है मुझे सूखे पे सुलाती हैं माँ खुद भूखी रह जाती हैं मेरा…

  • “पापा”

    फादर्स डे 16.06.2013 केअवसरपरमेरीएकमौलिककृतिकविता (पापा) सरल शब्दों में आपके समक्ष रख रहा हूँ, उम्मीद करता हूँ आपको पसन्द आयेगी। पापा जब मैं लड़खड़ाता गिरता उठता चलने में अपनी अंगुली पकड़ाकर मुझे सम्भाला आपने पापा मुझे ज्ञान ना था सही गलत का बचपन में बचपन का बोध कराकर सही राह दिखाई आपने कभी अच्छा जो किया मैंने तो प्यार भी…

  • जीने के लिये चंद साँसें चाहिये

    किसी को ज़मीन चाहिये तो किसी को आसमान चाहिये किसी को दौलत चाहिये तो किसी को शौहरत चाहिये किसी को युद्ध चाहिये तो किसी को नफ़रत चाहिये किसी को राजनीति चाहिये तो किसी को आरक्षण चाहिये उस शख़्श से पूछो ज़िंदगी के मायने जिसे पेट भरने के लिये एक सूखी रोटी चाहिये उस शख़्श से…

  • आओ खेलें होली

    रंजोग़म भुलाकर छलक रहे हैं रंग सारे प्यारे प्यारे खुशियों से लबालब छलक रहे है रंग सारे प्यारे प्यारे मस्ती में सराबोर है आलम सारा अलहदा सा है अल्हड़ अन्दाज़ न्यारा फ़िज़ा में जो रंग है इस मर्तबा ऐसा पहले ना था घटा में जो उमंग है इस मर्तबा ऐसा पहले ना थी आओ भर…

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    पिता है वृक्ष

    मैं भटकता पंछी, पिता है वृक्ष साया दे, छायाँ दे, संरक्षण दे साध सकूँ मैं अपना हर लक्ष्य पिता मेरे धनुष को वो बाण दे निराशा के तमस को दूर कर मुझे नित नई रोशनी का प्राण दे मैं भटकता पंछी, पिता है वृक्ष साया दे, छायाँ दे, संरक्षण दे ~ मनीष शर्मा

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