स्त्री हूँ मैं, स्त्री
~ मनीष शर्मा
~ मनीष शर्मा
Counsellor | Writer | Poet | Lyricist | Composer | Singer.
JMFA 2017 Winner of the best lyricist.
किसी को ज़मीन चाहिये तो किसी को आसमान चाहिये किसी को दौलत चाहिये तो किसी को शौहरत चाहिये किसी को युद्ध चाहिये तो किसी को नफ़रत चाहिये किसी को राजनीति चाहिये तो किसी को आरक्षण चाहिये उस शख़्श से पूछो ज़िंदगी के मायने जिसे पेट भरने के लिये एक सूखी रोटी चाहिये उस शख़्श से…
दूर से मुझको देखकर केकुछ बड़बड़ाती हो दूर से मुझको देखकर केकुछ बड़बड़ाती होपास आने पर मेरेक्यों चुप हो जाती हो दूर से मुझको देखकर केकुछ इतराती होदूर से मुझको देखकर केकुछ इतराती होपास आने पर मेरेक्यों तुम घबराती हो दूर से मुझको देखकर केपलकें उठाती होदूर से मुझको देखकर केपलकें उठाती होपास आने पर…
ना जाने किस दिशा किस डगर जा रहा है हिंदुस्तान का बचपन पढ़ने लिखने की उम्र में गलियों कूचों का कचरा बीन रहा है बचपन तन पर कपड़े मैले कुचैले कंधो पे लादे फटे कट्टे लिए भविष्य ढूँढ रहा है बचपन बेचकर के कचरा कोड़ियों के दाम में बिक रहा है बचपन पैरों के तलवे…
मैं भटकता पंछी, पिता है वृक्ष साया दे, छायाँ दे, संरक्षण दे साध सकूँ मैं अपना हर लक्ष्य पिता मेरे धनुष को वो बाण दे निराशा के तमस को दूर कर मुझे नित नई रोशनी का प्राण दे मैं भटकता पंछी, पिता है वृक्ष साया दे, छायाँ दे, संरक्षण दे ~ मनीष शर्मा
होली के पर्व पर मेरी ये रचना सरहद पर मुस्तैद जवानों को समर्पित। किन रंगों को मैं उछालूँ ?क्या ? उन रंगों को मैं उछालूँजिन रंगों से माँ की ओढ़नी कोबन रंगरेज़ा नितदिन रंगा करता था किन रंगों को मैं उछालूँ ?क्या ? उन रंगों को मैं उछालूँजो बचपन में दोस्तों संगहोली में खेला करता…
दर्द लिखने की आदत सी हो गई है मुझे दिल के ज़ख्म नासूर जो बन चुके हैं मेरे कागज़ भी अब ज़ख़्मी नज़र आने लगा है क़लम भी रक्त की स्याही से जो भरी है मेरे जिसे ज़माना बादलों की गर्जना कहता है वो आहों के कराहने की आवाज़ हैं मेरे हज़ारों तोहमतें लगा दो…