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    स्त्री हूँ मैं, स्त्री वात्सल्य से भरी गागर हूँ मैं ज्ञान से परिपूर्ण सागर हूँ मैं स्वभाव से चंचल नदी हूँ मैं काया से कोमल परी हूँ मैं प्रेम की बरखा हूँ मैं मोह का झरना हूँ मैं कड़ी धूप में छाँव हूँ मैं भरे शहर और गाँव हूँ मैं मेरे रूप स्वरूप हैं निराले…

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    पिता है वृक्ष

    मैं भटकता पंछी, पिता है वृक्ष साया दे, छायाँ दे, संरक्षण दे साध सकूँ मैं अपना हर लक्ष्य पिता मेरे धनुष को वो बाण दे निराशा के तमस को दूर कर मुझे नित नई रोशनी का प्राण दे मैं भटकता पंछी, पिता है वृक्ष साया दे, छायाँ दे, संरक्षण दे ~ मनीष शर्मा

  • तुम ही से हैं हम

    दाता ने दुनिया बनाई आदमी बनाये औरत बनाई प्यार बनाया क़ायनात बनाई ख़ुश रहने के लिए प्रकृति के अनुपम उपहार बनाये पर आदमी ने क्या किया धुंधले सपनों के भौंतिक साधन बनाये स्वार्थ के ऊँचे महल बनाये महल को उसने लोभ-लालच हिंसा-नफ़रत द्वेष-ईर्ष्या बलात्कार झूठ-मकार दोगले मुखोटों से अलंकृत किया भूल गया आदमी किसने उसे…

  • क्यों तुम शरमाती हो

    दूर से मुझको देखकर केकुछ बड़बड़ाती हो दूर से मुझको देखकर केकुछ बड़बड़ाती होपास आने पर मेरेक्यों चुप हो जाती हो दूर से मुझको देखकर केकुछ इतराती होदूर से मुझको देखकर केकुछ इतराती होपास आने पर मेरेक्यों तुम घबराती हो दूर से मुझको देखकर केपलकें उठाती होदूर से मुझको देखकर केपलकें उठाती होपास आने पर…

  • दर्द लिखने की आदत

    दर्द लिखने की आदत सी हो गई है मुझे दिल के ज़ख्म नासूर जो बन चुके हैं मेरे कागज़ भी अब ज़ख़्मी नज़र आने लगा है क़लम भी रक्त की स्याही से जो भरी है मेरे जिसे ज़माना बादलों की गर्जना कहता है वो आहों के कराहने की आवाज़ हैं मेरे हज़ारों तोहमतें लगा दो…

  • आओ कुछ मशालें खरीद लें

    आख़िर कब तक मोमबत्तियां लेकर यूँ ही सड़कों पर उतरेंगें आओ कुछ मशालें खरीद लें अस्मत के लुटरों को राख कर दें हम क्यूँ कुछ नहीं बदलता है क्या हमारी आँखों का पानी मर चुका है या सब कुछ मूक दर्शक की भाँति देख सहने की आदत डाल चुके हैं हम ख़ुद की सुरक्षा माँगना…

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