Counsellor | Writer | Poet | Lyricist | Composer | Singer.
JMFA 2017 Winner of the best lyricist.
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ख़ुद को ढूँढने निकला हूँ ज़माने में
नचीज़ की कोई ख़ास पहचान नहीं ख़ुद को ढूँढने निकला हूँ ज़माने में ~ मनीष शर्मा
बस रात ही रात रहने दे
ऐ ख़ुदा, बस रात ही रात रहने दे हुई जो सहर महबूब चला जायेगा ~ मनीष शर्मा
जीवन है खेला
जीवन है खेला, हम तुम खिलौने आज जो खेला, कल उसी ने तोड़ा ख़्वाबों में महल, हक़ीकत में झुग्गी ख़ामख़्वाह, बेमुकाम ख़ानाबदौश सफ़र ~ मनीष शर्मा
शराब शबाब और क़बाब
शराब, शबाब और क़बाबदिखे ये दुनिया इनकी दासमिलता है अगर लुत्फ़ इनसेतो पर्दानशीं क्यों है समाज ? ~ मनीष शर्मा
तुम पहचान भी लो मुझे
बेशक तुम अच्छे से जानती हो मुझे लेकिन ख़्वाहिश हैं मेरी कि किसी रोज़ बहुत अच्छे से तुम पहचान भी लो मुझे ~ मनीष शर्मा
प्रेम ओ सूकूँ है
ख़्वाहिशों के पीछे तो ये जिस्म भागता रहा ताउम्र रूह की आरज़ू तो प्रेम ओ सूकूँ है आज भी ~ मनीष शर्मा
