Counsellor | Writer | Poet | Lyricist | Composer | Singer.
JMFA 2017 Winner of the best lyricist.
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इंसान ढूँढ रहा हूँ मैं
कब से चारों दिशाओं में अब तक नहीं मिला कैसे यक़ीन करूँ फ़रिश्ते हुए थे कभी इसी धरा पर ~ मनीष शर्मा
बोसा दिया था तुमने
आओ कि आज भी वो जगह खाली है मेरे गर्दन की जहाँ उस रात बड़े ही प्यार से बोसा दिया था तुमने ~ मनीष शर्मा
अपना ख़ुदा कर लिया है
जब से तुमने नज़रें फेरी तब से ख़ुद को नज़रबंद कर लिया है मस्ज़िद का ख़ुदा रूठे तो रूठे अब तुम्हें अपना ख़ुदा कर लिया है ~ मनीष शर्मा
हर एक शख़्श
हर एक शख़्श की आँखों में आईना हैं मैंने अपने घर के सारे शीशे तोड़ डाले हर एक शख़्श के हाथों में ख़ंज़र हैं मैंने अपने घर के छुरी, कटार फेंक डाले ~ मनीष शर्मा
तुम मेरे बारे में बुरा कहो
तुम मेरे बारे में बुरा कहो, बहुत बुरा कहो एक दिन मैं अच्छा, बहुत अच्छा होता चला जाऊँगा ~ मनीष शर्मा
मैं फ़िर से खो जाना चाहता हूँ
मैं फ़िर से खो जाना चाहता हूँ दुनिया की भीड़ में उम्मीद, शायद फिर कहीं से ढूँढने तुम आ जाओ एक बार ~ मनीष शर्मा
