Counsellor | Writer | Poet | Lyricist | Composer | Singer.
JMFA 2017 Winner of the best lyricist.
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ये मैं कृष्ण से पूछ रहा हूँ
श्रीमद्भागवत गीता के भीतर उतरकर, ख़ुद को ढूँढ रहा हूँ कौन हूँ मैं, क्यूँ हूँ मैं, कहाँ हूँ मैं, ये मैं कृष्ण से पूछ रहा हूँ ~ मनीष शर्मा
मिले किताबों में
ताउम्र जिन्हें मैं ढूँढता रहा ज़माने में वे सभी मुझे, छपे मिले किताबों में ~ मनीष शर्मा
ऐ दुनिया वालों तुम्हें मुबारक
उसकी ज़ुफों की घनेरी छाँव हैं आशियाना मेरा पत्थर, ईंटों के महल, ऐ दुनिया वालों तुम्हें मुबारक ~ मनीष शर्मा
मुतलक़ ज़िंदगी
मुतलक़ ज़िंदगी, जो भी बशर है जी रहा असल में ज़िंदगी वही, बाकी सब फ़रेब ~ मनीष शर्मा
मेरी अंगुलियाँ
ज़िंदगी तब बड़ी ही सुलझी-सुलझी हुई सी लगती थी तुम्हारी उलझी ज़ुल्फों को जब सुलझाती थीं, मेरी अंगुलियाँ ~ मनीष शर्मा
मैं सुलग रहा हूँ तेरे बिना
सर्द रातें लोग ठिठुर रहे हैं मैं सुलग रहा हूँ तेरे बिना ~ मनीष शर्मा
