Counsellor | Writer | Poet | Lyricist | Composer | Singer.
JMFA 2017 Winner of the best lyricist.
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लौट आये घराने में
जब कुछ भी ना बदल पाये ज़माने में हम ख़ुद को बदल लौट आये घराने में ~ मनीष शर्मा
इश्क़ करें या करें पढ़ाई
इश्क़ करें या करें पढ़ाई, युवाओं का बस यही सवाल हैपढ़ के ही इश्क़ लुत्फ़ देगा, बिन पढ़ाई ज़िंदगी ख़राब है ~ मनीष शर्मा
तुम्हारी इक मुस्कुराहट ने
तुम्हारी इक मुस्कुराहट ने फिर से ज़िंदा किया मुझे जीते जी मौत क्या है, जाना मैंने तुमसे बिछड़ जाने के बाद ~ मनीष शर्मा
ऐ मनीष तू कैसे ग़म भुलायेगा
मयखानों में रोज़ मय मशरूब कर अपने ग़म भुलाते हैं मय – नोश ऐ “मनीष” तू कैसे ग़म भुलायेगा, तू मय को लबों से छूता जो नहीं ~ मनीष शर्मा
वो सब दिखाई देता है
मुझे अनवरत वो सब दिखाई देता है जिसे देखकर अनदेखा करते हैं सब ~ मनीष शर्मा
दूजे के पास ज़्यादा क्यूँ है
बशर का ग़म ये नहीं है कि उसके पास दौलत कम है वो ग़म में डूबा इसलिए कि दूजे के पास ज़्यादा क्यूँ है ? ~ मनीष शर्मा
